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योग

योग हमारे भौतिक एवं भावनात्मक अस्तित्व व व्यक्तित्व को संवारने तथा वामन से विराट होने की साधना है।

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स्वदेशी

स्वदेशी भाषा, वेशभूषा, भेषज, भजन- यह मात्र भावना या स्वार्थ पर टिका हुआ दर्शन नहीं, अपितु व्यष्टि, समष्टि व राष्ट्र के सर्वांगीण गौरवशाली विकास एवं समृद्धि का मूल है। यह समग्र, स्थायी, अहिंसक व न्यायपूर्ण विकास या समृद्धि का दर्शन है।

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जीवन की प्रेरणा

हर दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठते ही ये विचार व चिंतन करें कि मैं मूलतः ईश्वर की संतान, ऋषि-ऋषिकाओं, वीर-वीरांगनाओंकी संतान या भारत माता की संतान हूँ।

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दिव्यता से जुड़ना योग

आत्मा जब परमात्मा की उपासना करता है तो भगवान् के दिव्य ज्ञान, दिव्य प्रेरणा, दिव्य सामर्थ्य, दिव्य सुख-शान्ति एवं दिव्य आनन्द से युक्त हो जाता है। भगवान् की दिव्यता से जुड़ना यही योग है।

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दिव्य जीवन का उपाय

योगचेतना, उच्चचेतना, दिव्यचेतना, आत्मचेतना, गुरुचेतना, ऋषिचेतना व भागवत चेतना में जीने का प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करें|

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ब्रह्म-सम्बन्ध्

भगवान् ही माता-पिता बनकर हमें जन्म देते हैं तथा गुरु बनकर हमें ज्ञान देते हैं। इस प्रकार सब सम्बन्धों में ब्रह्म-सम्बन्ध् की अनुभूति करना ही योग है।

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