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योग क्या है

अतीत व्यतीत हो चुका है, भविष्यत अनागत है अतः जहाँ हो वहीं समग्रता से वर्तमान में जीना, ही योग है।

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संतुलन ही स्वास्थ्य है

संतुलन ही जगत व जीवन का शाश्वत सिध्दान्त है, संतुलन ही स्वास्थ्य है, भौतिक एवं भावनात्मक असंतुलन, अनियन्त्राण, अनियमितता व विषमता से ही सब रोगों का जन्म होता है।

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अपनी शक्तियों को पहचानों

बिना संघर्ष किए कभी भी विजय नहीं मिलती, अतः अपनी शक्तियों को पहचानों एवं संगठित होकर इन आसुरी शक्तियों को परास्त कर दो।

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ईश्वरीय शक्ति

मनुष्य योग के द्वारा जब ईश्वरीय शक्ति से सम्पन्न हो जाता है तो वह देवता, महापुरुष, युगपुरुष, युगनिर्माता, युगदृष्टा या महामानव बन जाता है।

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तृष्णा तृप्त नहीं होती

जीने के लिए दो गज जमीन, तन ढ़कने के के लिए दो वस्त्रा एवं भूख मिटाने के लिए दो रोटी तो सबको मिल ही जाती है। तृष्णा किसी भी व्यक्ति की कभी तृप्त नहीं होती।

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वैराग्य का पूर्ण लक्षण

वैराग्य नाम पलायन का नहीं अपितु विवेक-ज्ञान की पराकाष्ठा का नाम ही वैराग्य है। सम्यक् दृष्टि पाकर अनासक्त होकर निरन्तर प्रगतिशील, संघर्षशील, पुरुषार्थी बने रहना ही वैराग्य का पूर्ण लक्षण है।

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