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संसाधन व संभावना

व्यक्ति के भीतरी संसाधनों के साथ परमात्मा ने प्रकृति में भी असीम संसाधन व संभावनाओं को पिरोया हुआ है | इन बाह्म व आन्तरिक संसाधनों का अत्यन्त विवेक पूर्ण उपयोग करने हेतु हमें अत्यन्त पुरुषार्थ व परमार्थ करते रहना चाहिए|

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पूर्ण सुखी जीवन

पूर्ण सुखी जीवन जीने के दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपाय है| एक हम बाह्मरूप से आर्थिक दरिद्रता से मुक्त रहें तथा दूसरा उपाय है हम ईश्वर प्रदत्त पूर्णता से युक्त रहें| बाह्म समृद्धि से हम बाहर से सुखी, स्वस्थ, सुरक्षित, सम्मानित व शान्तिपूर्ण जीवन जी सकें तथा अपने भीतर की निजता, दिव्यता व समस्त प्रकार की […]

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सेवा के अवसर ढू़ंढ़ते रहना चाहिए

बिना सेवा के चित्त शुद्धि नहीं होती है और चितशुद्धि के बिना परमात्मतत्त्व की अनुभूति नहीं होती। अतः सेवा के अवसर ढू़ंढ़ते रहना चाहिए।

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असम्भव को सम्भव

असम्भव को सम्भव करने की अपार क्षमता, सामर्थ्य व ऊर्जा तुम्हारे भीतर सन्निहित है। काल के भाल पर अपनी शक्ति, साहस व शौर्य से नया इतिहास लिखो।

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साधनाकाल

साधनाकाल में साधक सविचार समाधि व निर्विचार समाधि का पूर्ण आनन्द अनुभव करता हुआ सदा प्रसन्न व आनन्दित रहता है| साधनाकाल में समाधि तथा व्यवहार काल में दिव्य जीवन की साधना करने निष्काम सेवा करना हुआ भगवान के लिए ही जीता है |

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जीवन का ध्येय

भीतर से पूर्ण शांत योगस्थ आत्मस्थ रहकर बाहर से अपनी-अपनी मूल प्रकृति के अनुसार विविध क्षेत्रों में पूर्ण क्रियाशील रहें, पुरुषार्थ सृजन या सेवा की पराकाष्ठ में जिएं| अपने कर्मो की आहुति अनन्त के लिए अर्पित करते हुए सदा ब्रह्मभाव या एकत्व के दिव्यभाव में जीते हुए सहज, शान्त, पूर्ण आनन्दमय जीवन जिएं|

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