जब हमें यह बोध हो गया कि समस्त ज्ञान, शक्ति एवं ऐश्वर्य का मूल आधार भगवान है तो हम निमित्त मात्र होकर, भगवान् के यंत्र बनकर वेदानुकूल, शास्त्रानुकूल, ऋषियों या मुद्दे के अनुकूल व आत्मनुकुल आचरण करने लगते हैं |इसी को प्रीति पूर्वक, धर्मानुसार यथायोग्य न्यायपूर्ण व विवेकपूर्ण व्यवहार भी करते हैं| हम अकर्त्ता होकर कर्म करने लगते हैं, यही योगी का कर्मयोग या दिव्यकर्म है