ये दो जीवन रूपी नदी के दो तीर हैं| योग केन्द्र है, यज्ञ परिधि है, हमारे जीवन की| योग का अर्थ है शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक…सभी प्रकार की शक्तियों का अर्जन तथा यज्ञ से तात्पर्य है, सर्वहित में, सबसे सुख व प्रशन्नता के लिए उन शक्तियों को सेवा में लगाना|