अकाम, निष्काम या पूर्णकाम होकर अपने भीतर व बाहर सम्पूर्ण अस्तित्व में पूर्णता अनुभव करते हुए, समस्त अविवेकपूर्ण कामनाओं से मुक्त रहना तथा आत्मा में परमात्मा की जो भी प्रेरणा होती है, उसी के अनुरूप आचरण, पुरुषार्थ या निष्काम कर्म करें |