श्रेय व प्रेयः- देवयान या पितृयाण के रूप में दो मार्ग है हमारे सामने। अपनी मूल प्रकृति प्रारब्ध् पुरुषार्थ आलम्बन व अभ्यासों के कारण हम किसी भी मार्ग पर चले यह हमारी स्वाधीनता है परन्तु हम जो भी बनें प्रथम कोटि के बनें।