भीतर से पूर्ण शांत योगस्थ आत्मस्थ रहकर बाहर से अपनी-अपनी मूल प्रकृति के अनुसार विविध क्षेत्रों में पूर्ण क्रियाशील रहें, पुरुषार्थ सृजन या सेवा की पराकाष्ठ में जिएं| अपने कर्मो की आहुति अनन्त के लिए अर्पित करते हुए सदा ब्रह्मभाव या एकत्व के दिव्यभाव में जीते हुए सहज, शान्त, पूर्ण आनन्दमय जीवन जिएं|