साधनाकाल में साधक सविचार समाधि व निर्विचार समाधि का पूर्ण आनन्द अनुभव करता हुआ सदा प्रसन्न व आनन्दित रहता है| साधनाकाल में समाधि तथा व्यवहार काल में दिव्य जीवन की साधना करने निष्काम सेवा करना हुआ भगवान के लिए ही जीता है |