व्यक्ति के भीतरी संसाधनों के साथ परमात्मा ने प्रकृति में भी असीम संसाधन व संभावनाओं को पिरोया हुआ है | इन बाह्म व आन्तरिक संसाधनों का अत्यन्त विवेक पूर्ण उपयोग करने हेतु हमें अत्यन्त पुरुषार्थ व परमार्थ करते रहना चाहिए|