सब मनुष्यों व मनुष्येतर जोवो व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भगवान ने जो पूर्णता प्रदान की हुई है उसमें पूर्ण संतुष्ट सुखी व आनन्दित रहें तथा बीज रूप में परमेश्वर ने हमें जो दिव्य ज्ञान, दिव्य भाव, दिव्य सामर्थ्य तथा दिव्य साधन दिए हुए हैं इनका अपने पुरुषार्थ से विस्तार व विकास करें साथ ही वेदानुकूल आचरण करते हुए जीवन का प्रयोजन पूव करें| वेदानुकूल आचरण को ही हम शब्दान्तर से शास्त्रानुकूल, गुरु के अनुकूल या आत्मअनुकूल आचरण आदि शब्दों से कहते हैं |