प्रेम, वासना नहीं उपासना है। वासना का उत्कर्ष प्रेम की हत्या है प्रेम समर्पण एवं विश्वास की पराकाष्ठा है। प्रेम, करुणा एवं वात्सल्य हमारा स्वधर्म है।