पूर्ण परिश्रम के उपरांत जो कुछ भगवान के क्रम फल के अनुरूप हमें मिलता है, उसमे संतुष्ट रहना| भवान के क्रम फल व्यवस्था के अनुरूप जो हमने पुरुषार्थ किया, वो हमें मिलता है, उसमे संतुष्ट रहना हैं और उसको भी सेवा में ही लगाना संतोषी सदा सुखी|