स्वदेशी भाषा, वेशभूषा, भेषज, भजन- यह मात्र भावना या स्वार्थ पर टिका हुआ दर्शन नहीं, अपितु व्यष्टि, समष्टि व राष्ट्र के सर्वांगीण गौरवशाली विकास एवं समृद्धि का मूल है। यह समग्र, स्थायी, अहिंसक व न्यायपूर्ण विकास या समृद्धि का दर्शन है।