श्रेणी पुरालेख | दैनिक विचार | पृष्ठ 2

Archive

भक्तियोग

ज्ञानपूर्वक अकर्त्ता होकर जो दिव्य कर्म किया जाता है वही भक्तियोग है| अकाम, अचाह या निष्काम होकर अनासक्त भाव से हम जो भी सेवा, कर्म, तप, पुरुषार्थ या दिव्य प्रर्वत्ति करते हैं सब भक्तियोग ही है| यह भक्ति भाव के स्तर पर भी आचरण या व्यवहार के स्तर पर भी भगवान् के प्रति पूर्ण समर्पण […]

० टिप्पणी
आगे पढ़ें
divider

अध्यात्म का सत्य है

अकाम, निष्काम या पूर्णकाम होकर अपने भीतर व बाहर सम्पूर्ण अस्तित्व में पूर्णता अनुभव करते हुए, समस्त अविवेकपूर्ण कामनाओं से मुक्त रहना तथा आत्मा में परमात्मा की जो भी प्रेरणा होती है, उसी के अनुरूप आचरण, पुरुषार्थ या निष्काम कर्म करें |

० टिप्पणी
आगे पढ़ें
divider

योग एवं यज्ञ:

ये दो जीवन रूपी नदी के दो तीर हैं| योग केन्द्र है, यज्ञ परिधि है, हमारे जीवन की| योग का अर्थ है शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक…सभी प्रकार की शक्तियों का अर्जन तथा यज्ञ से तात्पर्य है, सर्वहित में, सबसे सुख व प्रशन्नता के लिए उन शक्तियों को सेवा में लगाना|

० टिप्पणी
आगे पढ़ें
divider

मैं भारत से हूँ

मेरा सिर हिमालय, मेरी बाईं भुजा पूर्वांचल व चरणों की ओर हिन्द महासागर है। मुझमें भारत है। मैं भारत से हूँ। मैं भारत हूँ।

० टिप्पणी
आगे पढ़ें
divider

श्रद्धा

श्रद्धा माँ, और विश्वास पिता है। श्रद्धा सत्य ज्ञान की उपलब्धि एवं परमशक्ति का सोपान है। श्रद्धा आध्यात्मिक जीवन का अभिषेक तत्व है।

० टिप्पणी
आगे पढ़ें
divider

कठोर अनुशासन व दृढ़ता

फूल से अधिक कोमल स्वभाव एवं वज्र से अधिक कठोर अनुशासन व दृढ़ता वाली प्रकृति के लोग ही सच्चे अनुशास्ता, प्रशासक या नेता हो सकते हैं।

० टिप्पणी
आगे पढ़ें
divider
पिछला पृष्ठ | अगला पृष्ठ