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निमितमात्रा

पापी तो अपने-अपने पाप स्वयं ही भर रहे हैं तुम निमितमात्रा बनकर यश, सम्मान व संतुष्टि पाने के लिए आगे नहीं आये, तो यह यश तुम्हें नहीं किसी और को मिलेगा।

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क्षितिज

मौन में दिव्य ज्ञान

जब मैं अकेला होता हूँ तो वहाँ खालीपन नहीं होता, वहाँ मौन में मैं दिव्य ज्ञान व ईश्वरीय प्रेरणा के अजड्ड प्रवाह से आप्लावित रहता हूँ और बाहर-भीतर व चारों ओर एक अखण्ड ज्योतिपुँज से स्वयं को सदा आलोकित पाता हूँ।

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सोलह संस्कार

मेरा स्वाभिमान

मेरे पूर्वज हैं, मेरा स्वाभिमान। अपने ज्ञान, कर्म व जीवन से मैं बनाऊँगा, अपनी पहचान व बढ़ाऊँगा माता-पिता, गुरु वंश व देश का सम्मान।

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योग-आन्दोलन

योग-आन्दोलन से हम इस ध्रती पर रिश्रियो ऋषियों को पुनः स्थापित कर सुख, समृद्धि, आनन्द एवं शान्ति का साम्राज्य लायेंगे।

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