नवीनतम प्रविष्टियां | पृष्ठ 2

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मनुष्यता

विचारशीलता ही मनुष्यता और विचारहीनता ही पशुता है। पवित्र विचार-प्रवाह ही मधुर वाणी व प्रभावशाली जीवन का मूल स्रोत्र है।

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विचारों का परिणाम

विचारों का ही परिणाम है – हमारा सम्पूर्ण जीवन। विचार ही बीज है, जीवनरूपी इस वृक्ष का।

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मृत्यु समाधान नहीं

मृत्यु समाधान नहीं, क्योंकि मरकर पुनः जन्म लेना सुनिश्चित है, अतः दुनियाँ से भयभीत होकर, अपनों की पीड़ा एवं विश्वासघात से आहत होकर अवसाद में मृत्यु को स्वीकारना मूर्खतापूर्ण होगा।

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शुभकर्म

सज्जन व कर्मशील व्यक्ति तो यह जानता है कि शब्दों की अपेक्षा कर्म अधिक जोर से बोलते हैं। अतः वह अपने शुभकर्म में ही निमग्न रहता है।

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जीवन प्रबन्धन

योग स्वस्थता, उत्पादकता, सृजनात्मकता, सकारात्मकता व गुणात्मकता की वृद्धि करने का एक उत्कृष्ट जीवन प्रबन्धन है।

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धर्म का सर्वस्व

धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये ।

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