नवीनतम प्रविष्टियां | पृष्ठ 3

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योग

भगवान् ही माता-पिता बनकर हमें जन्म देते हैं तथा गुरु बनकर हमें ज्ञान देते हैं। इस प्रकार सब सम्बन्धों में ब्रह्म-सम्बन्ध की अनुभूति करना ही योग है।

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उच्च और दिव्य विचार रखने चाहिए

गलत आहार का एक कण भी हमारे शरीर में ज़हर भर देता है, गलत विचार का एक क्षण भी हमारे दिमाग में ज़हर भर देता है। विचारों की अपवित्राता ही हिंसा, अपराध्, क्रूरता, शोषण, अन्याय, अधर्म और भ्रष्टाचार का कारण है।

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जीवन

बड़ा धर्म

राष्ट्र-धर्म सबसे बड़ा धर्म है। राष्ट्रदेव बड़ा देवता व राष्ट्रप्रेम सबसे उत्कृष्ट कोटि का प्रेम है। राष्ट्रहित सर्वोपरि है। राष्ट्र मेरा सर्वस्व है। इदं राष्ट्राय इदन्न मम। मेरा तन-मन-धन व जीवन राष्ट्रहित में समर्पित रहेगा।

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संस्कार

जीवन का मूल स्रोत

विचारशीलता ही मनुष्यता और विचारहीनता ही पशुता है। पवित्रा विचार-प्रवाह ही मधुर वाणी व प्रभावशाली जीवन का मूल  स्रोत है।

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