नवीनतम प्रविष्टियां | पृष्ठ 4

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पवित्र विचार

जब अपवित्र विचारों से एक व्यक्ति के भीतर घृणा व नफरत के बीज बोये जा सकते हैं तो पवित्र विचारों से एक व्यक्ति के जीवन में प्रेम, करुणा व वात्सल्य के पुष्प क्यों नहीं खिलाए जा सकते?

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वर्णाश्रम धर्म

मेरे मस्तिष्क में ब्राह्मण जैसा विवेक, मेरी भुजाओं में क्षत्रियों जैसा शौर्य, बल पराक्रम ऊर्जा व स्वाभिमान, उदर में वैश्य जैसा व्यापार व प्रबन्धन कौशल व चरणों में शूद्रवत् सेवा करने का सामर्थ्य है। यही मेरा वर्णाश्रम धर्म है।

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कर्मफल

कर्मफल कर्म करने वाले को ही मिलता है तथा उसका प्रभाव, परिणाम, लाभ, हानि, यश व अपयश आदि अन्य व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र व समष्टि को भी प्राप्त होता है।

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भगवान् का प्रसाद

मैं जो भी पा रहा हूँ, सब भगवान् का प्रसाद है। मैं भगवान् का पुत्र-पुत्री हूँ, वह विश्वनियन्ता ब्रह्माण्ड का रचयिता भगवान् मेरा पिता है, विश्व की सर्वोपरि सत्ता-शक्ति के आशीष, सदा मेरे शीश पर हैं।

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राष्ट्रवादी

पूजा-भक्ति में प्रथम पूजा-भक्ति राष्ट्र की, उसके बाद ईश-भक्ति, मातृ-पितृ भक्ति व गुरुभक्ति आदि को मानना। वन्दना में प्रथम राष्ट्रवन्दना, धयान में प्रथम देश का धयान, चिन्तन व चिन्ता में भी प्रथम राष्ट्र का चिन्तन व राष्ट्र की चिन्ता, काम में प्रथम देश का काम, अभिमान में जो प्रथम स्वदेश का स्वाभिमान करे, वह राष्ट्रवादी […]

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संन्यास

न जीवन से पलायन, न मौत का गम, हमें रहना है सदा सम, यही योग है। अनासक्त होकर कर्मफल की इच्छा से रहित होकर जी संन्यास है।

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