नवीनतम प्रविष्टियां | पृष्ठ 4

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योग की उपलब्धि

योग की सबसे बड़ी उपलब्धि है अज्ञान व अज्ञानजनित दोषों, अहंकार, अभाव, क्लेशों, विकारों व समस्त अशुभ से मुक्त होकर अपनी निजता, अपने मूल स्वरूप या मूल स्वभाव में जीना, यही योग है|

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तृष्णा कभी तृप्त नहीं होती

जीने के लिए दो गज जमीन, तन ढ़कने के के लिए दो वस्त्र एवं भूख मिटाने के लिए दो रोटी तो सबको मिल ही जाती है। तृष्णा किसी भी व्यक्ति की कभी तृप्त नहीं होती।

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आग्रह नहीं होना चाहिए

जीवन के क्षेत्र में क्षितिज तक वे ही पहुँचते हैं जो आग्रह नहीं रखते। आग्रह हमें कुण्ठित एवं संकीर्ण बना देते हैं। आग्रह के टूटने पर सत्य का द्वार अनावृत होता है।

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भक्तियोग

ज्ञानपूर्वक अकर्त्ता होकर जो दिव्य कर्म किया जाता है वही भक्तियोग है| अकाम, अचाह या निष्काम होकर अनासक्त भाव से हम जो भी सेवा, कर्म, तप, पुरुषार्थ या दिव्य प्रर्वत्ति करते हैं सब भक्तियोग ही है| यह भक्ति भाव के स्तर पर भी आचरण या व्यवहार के स्तर पर भी भगवान् के प्रति पूर्ण समर्पण […]

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अध्यात्म का सत्य है

अकाम, निष्काम या पूर्णकाम होकर अपने भीतर व बाहर सम्पूर्ण अस्तित्व में पूर्णता अनुभव करते हुए, समस्त अविवेकपूर्ण कामनाओं से मुक्त रहना तथा आत्मा में परमात्मा की जो भी प्रेरणा होती है, उसी के अनुरूप आचरण, पुरुषार्थ या निष्काम कर्म करें |

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योग एवं यज्ञ:

ये दो जीवन रूपी नदी के दो तीर हैं| योग केन्द्र है, यज्ञ परिधि है, हमारे जीवन की| योग का अर्थ है शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक…सभी प्रकार की शक्तियों का अर्जन तथा यज्ञ से तात्पर्य है, सर्वहित में, सबसे सुख व प्रशन्नता के लिए उन शक्तियों को सेवा में लगाना|

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